नई गाड़ी पहले ही साल में करीब 20% कीमत खो देती है। उसके बाद हर साल लगभग 15%। आपका लोन इतनी तेज़ी से नहीं घटता, खासकर शुरू में, जब किस्त का ज़्यादातर हिस्सा ब्याज में जाता है।
इसलिए शुरू के कुछ साल आप उतने के कर्ज़दार रहते हैं जितने की गाड़ी बिकेगी नहीं। यह तभी मायने रखता है जब कुछ गड़बड़ हो। लेकिन तब बहुत मायने रखता है।
गाड़ी बेच दीजिए, लोन चुका दीजिए, और फिर भी पैसा बाकी रहेगा।
यह कितने समय तक रहता है
मान लीजिए गाड़ी 800,000 की है, 150,000 आपने आगे दिए, बाकी 9% पर लिया। रकम किसी भी मुद्रा में इसी तरह चलेगी।
| लोन की अवधि | अंतर कब खत्म | सबसे बड़ा अंतर |
|---|---|---|
| 3 साल | 14वां महीना | 38,000 |
| 5 साल | 34वां महीना | 94,000 |
| 7 साल | 52वां महीना | 141,000 |
लोन जितना लंबा, खतरा उतना लंबा और अंतर उतना बड़ा। सात साल का लोन आपको चार साल से ज़्यादा इसी हालत में रखता है।
यह असल में कब दिक्कत बनता है
- दुर्घटना में गाड़ी पूरी तरह खराब हो जाए। बीमा गाड़ी की कीमत देगा, आपका बकाया नहीं। अंतर आपको भरना होगा।
- गाड़ी चोरी हो जाए। नतीजा वही।
- आपको जल्दी बेचनी पड़े। नौकरी बदली, शहर बदला, घर में कुछ बदला। बेचते समय ऊपर से पैसा देना पड़ेगा।
- आप बड़ी गाड़ी लेना चाहें। डीलर बचा हुआ अंतर नए लोन में जोड़ देगा, और नई गाड़ी भी उसी हालत से शुरू होगी।
दो बातें जो इसे छोटा करती हैं
शुरू में ज़्यादा पैसा दीजिए। ऊपर वाली गाड़ी में 150,000 की जगह 250,000 देने से अंतर करीब आठ महीने पहले खत्म हो जाता है। इससे बड़ा असर किसी और चीज़ का नहीं होता।
लोन छोटा रखिए। पांच से सात साल करने पर किस्त करीब 1,200 कम हो जाती है। लेकिन आप डेढ़ साल और इसी हालत में रहते हैं। अगर सिर्फ़ सात साल वाली किस्त ही आपके बजट में बैठती है, तो दिक्कत लोन में नहीं, गाड़ी की कीमत में है।